एक कविता

” आखिर कब तक “

वासना भरी हुई है शर्म भी मरी हुई ।। पाप का प्रकोप है, हवा भी है डरी हुई ।। अधर्म है ये पल रहा, धर्म क्यूँ है खल रहा।। देव भूमि में सुनो क्यूँ , अनर्थ हो प्रबल रहा।। चीर फाड है हो रही, मानवता भी सो रही ।। बालिका है ये सुनो , क्यूँ रौशनी है खो रही।। क्यूँ मौन हैं सभी यहाँ , इंसानियत है दबी यहाँ।। क्यूँ दरिंदगी फैल रही, के अर्थियाँ सजी यहाँ ।। हो ना चूक अब कोई , न निर्भ्या बने कोई ।। प्रण सुनो ये ले चलो, रण तुम करते चलो ।। पापियों का सन्घार हो, न कोई बलात्कार हो ।। सृजन हो नया यहाँ कि , न कोई अत्याचार हो ।। ✍वाणी